

शिकारी मानव के समय लोग कुछ भी नहीं उगाते और सब कुछ जंगल से बटोर लाते थे |वे जो अनाज, फल, सब्जी खाते थे सब जंगली ही उगाते थे| उन्हे कोई बोता नहीं था | ना ही उनकी कोई देखभाल करता था|बस जब अनाज या फल पक जाते हैं, तो लोग उन्हे काट कर खा लेते हैं | ऐसा लाखो सालो तक चलता रहा
जो शिकारी लोग लाखो सालो से जंगली फल और अनाज बटोरते , उन्हे मालुम तो होगा की कैसे बीज से पोधा उगाता है | उन्होंने आस पास ऐसे खूब सारे पोधों को उगते देखा होगा मगर फिर भी उन्होंने खेती शुरू नहीं की|इसका क्या कारण रहा होगा?और जिन लोगो ने खेती शुरू की उनको क्या जरूरत पड़ी होगी की वे खेती करने लगे?

ये सब हम पता नहीं कर सकते हैं, फिर भी उन दिनों के जो निशान और सबूत मिलते हैं उनसे हम कुछ अंदाज़ा लगा सकते हैं | इन सबूतो के आधार पर हम आप सबको एक कहानी सुना रहे हैं|



बहुत समय पहले एक शिकारी झुंड था |झुंड का नाम सुंगा झुंड था| वे एक खूबसूरत जगह में रहते थे और वे उस जगह के बारे में सब कुछ जानते थे जैसे मछलियां पानी में कब आती थे और घास चरने के लिए हिरण कहां जाते थे
झुंड में दो बच्चे थे |रमेश और उसकी छोटी बहन रोहिणी|दोनो को अनाज के दाने भीगो कर खाना बहुत पसंद था |

एक दिन वे नदी किनारे बैठ कर दाने खा रहे थे की अचानक जंगली कुत्ता आ गया |मारे डर के दोनो भाग पड़े|



कुछ दिन बाद जब नदी किनारे गए तो देखा वहां नए अनाज के पौधे उगे हैं|

रोहिणी बोली, "यहाँ हमसे दाने छूट गए थे| क्या उनको चिड़िया ले गई?"

रमेश बोला, "नहीं मुझे लगता है की उन्ही में से पौधे निकले हैं - जैसे बरसात के मौसम में आम की गुठली से पेड़ निकलता है"
रोहिणी बोली," फिर से फेक कर देखे?"


तो दोनो मां के पास गए और दाने मांगे |पर मां ने दाने देने से मन कर दिया | वह बोली, "इतनी मुश्किल से दाने इकट्ठा किए हैं इनसे कई दिनो तक काम चलाना हैं"|
फिर भी, अगले दिन दोनो ने चुपके से कुछ दाने उठाये और घर के पीछे फेक दिए|


रोहिणी बोली,"दानो को मिट्टी से ढक देते हैं| फिर पाक्षी उन्हे नहीं खायेंगे"


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